मोदी मंदिर पटना को लेकर इंटरनेट पर बहुत सी बातें चल रही हैं। कोई कहता है कि मंदिर बन रहा है, कोई कहता है कि सरकार ने 112 करोड़ रुपये दे दिए हैं। सच इससे काफ़ी अलग है। 29 जुलाई 2026 को बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर पटना में मंदिर बनाने का एक प्रस्ताव पास किया। बस इतना ही पक्का है। न ज़मीन तय हुई है, न पैसा मंज़ूर हुआ है, न कोई नक्शा सामने आया है।

इस लेख में हम सीधी और आसान भाषा में बताते हैं कि अब तक क्या हुआ, किसने क्या कहा, कौन सी बात सिर्फ़ दावा है, कानून क्या कहता है, और मंदिर बनने से पहले क्या-क्या होना ज़रूरी है। हर बात के पीछे किसी समाचार संस्थान की रिपोर्ट है, जिसका नाम हमने साथ में लिखा है।

मुख्य बातें

  • 29 जुलाई 2026 को बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की पहली बैठक में मोदी मंदिर का प्रस्ताव पास हुआ। यह प्रस्ताव बोर्ड सदस्य राजन सिंह ने रखा था।
  • 5 एकड़ ज़मीन और 112 करोड़ रुपये की बात राजन सिंह के अपने बयानों से आई है। यह सरकार से की गई मांग है, मंज़ूर बजट नहीं।
  • 20 अगस्त 2026 को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में "मोदी चालीसा" पढ़ी गई। क्लब ने कहा कि उसने यह कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था और उसे रोक दिया।
  • Queerbeat की रिपोर्ट के अनुसार बोर्ड की एक दूसरी सदस्य ने इसे राजन सिंह का "निजी एजेंडा" कहा है। यानी बोर्ड में भी इस पर पूरी सहमति होने का दावा विवादित है।
  • 27 अक्टूबर 2026 तक हमें किसी ज़मीन, सरकारी आदेश, ट्रस्ट या निर्माण की तारीख़ की कोई रिपोर्ट नहीं मिली।

29 जुलाई 2026 को बोर्ड ने क्या पास किया?

PTI की रिपोर्ट, जो ThePrint पर 29 जुलाई 2026 को छपी, के अनुसार बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की पहली बैठक उसी दिन, बुधवार को, पटना में हुई। इस बैठक में नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने का प्रस्ताव पास किया गया। Free Press Journal ने लिखा कि बैठक पुराने सचिवालय में समाज कल्याण विभाग में हुई।

इस बोर्ड को बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड भी कहा जाता है। Drishti IAS के 31 जुलाई के नोट के अनुसार बोर्ड में 28 सदस्य हैं, यह समाज कल्याण विभाग के तहत काम करता है, और इसे अगस्त 2025 में बनाया गया था।

एक बात साफ़ समझ लें। बोर्ड का प्रस्ताव पास करना कोई कानून, सरकारी आदेश या अदालत का फ़ैसला नहीं है। यह एक सलाह या मांग जैसा कदम है। बोर्ड के पास अपने आप ज़मीन देने या सरकारी ख़ज़ाने से पैसा निकालने का अधिकार होने की कोई रिपोर्ट हमें नहीं मिली। इस बैठक पर विस्तार से हमारी अंग्रेज़ी रिपोर्ट बोर्ड के प्रस्ताव की पूरी कहानी में है।

प्रस्ताव किसने रखा और क्यों?

प्रस्ताव बोर्ड सदस्य राजन सिंह ने रखा। बाद की रिपोर्टों में उन्हें बोर्ड का उपाध्यक्ष भी बताया गया है। PTI उनके नाम को "Ranjan" लिखता है, जबकि Free Press Journal, ETV Bharat और Queerbeat "Rajan" लिखते हैं। हम राजन सिंह लिखते हैं।

PTI के अनुसार राजन सिंह ने अंग्रेज़ी में कहा कि उन्होंने यह प्रस्ताव इसलिए रखा क्योंकि मोदी ने "हमें सम्मान और अधिकार दिए"। यह उनके बयान का हमारा हिंदी अनुवाद है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के ट्रांसजेंडर समुदाय का अपना कोई मंदिर नहीं है।

ये राजन सिंह के अपने कारण हैं। बोर्ड के दूसरे सदस्य, समुदाय के लोग और कानून के जानकार इसे अलग नज़र से देख सकते हैं, जैसा आगे बताया गया है। राजन सिंह के बारे में जो सार्वजनिक जानकारी है, वह हमारी राजन सिंह प्रोफ़ाइल में है।

5 एकड़ और 112 करोड़ रुपये: मांग या मंज़ूरी?

सबसे ज़्यादा भ्रम इसी बात पर है। 29 जुलाई की पहली रिपोर्टों में कोई रकम नहीं थी। Free Press Journal ने सिर्फ़ इतना लिखा कि राजन सिंह के अनुसार राज्य सरकार पटना में ज़मीन तय करेगी और निर्माण का पूरा ख़र्च उठाएगी।

रकम पहली बार 11 अगस्त 2026 को सामने आई। ETV Bharat ने राजन सिंह का बयान छापा कि बोर्ड ने मंदिर के लिए सरकार से पाँच एकड़ ज़मीन और 112 करोड़ रुपये की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि अब यह प्रस्ताव कैबिनेट सचिवालय जाएगा, और योजना में मोदी की सोने की आदमक़द मूर्ति शामिल है। उसी दिन PatnaPress ने भी यही आँकड़े दिए, पर साफ़ लिखा कि यह "अभी मंज़ूर परियोजना नहीं है"।

बातक्या कहा गयाकिसने कहासरकार ने पुष्टि की?
ज़मीन5 एकड़ की मांगराजन सिंह, ETV Bharat और PatnaPress के अनुसारकोई रिपोर्ट नहीं मिली
रकम112 करोड़ रुपये की मांगराजन सिंह, ETV Bharat, PatnaPress और The Federal के अनुसारकोई रिपोर्ट नहीं मिली
ख़र्च कौन उठाएगाराज्य सरकार, या सरकार और चंदा मिलकरराजन सिंह, Free Press Journal और Navbharat Live के अनुसारकोई रिपोर्ट नहीं मिली
मूर्तिमोदी की सोने की आदमक़द मूर्तिराजन सिंह, ETV Bharat के अनुसारकोई रिपोर्ट नहीं मिली
आगे की प्रक्रियाप्रस्ताव कैबिनेट सचिवालय जाएगाराजन सिंह, ETV Bharat के अनुसारभेजे जाने की कोई रिपोर्ट नहीं मिली

एक करोड़ मतलब एक सौ लाख, यानी 112 करोड़ रुपये मतलब 1,12,00,00,000 रुपये। यह बड़ी रकम है, इसलिए इस पर ध्यान से बात करनी चाहिए। मांग करना और मंज़ूरी मिलना दो अलग बातें हैं। जैसे कोई स्कूल का क्लब प्रिंसिपल से पुस्तकालय के लिए पैसे मांगे, तो इसका मतलब यह नहीं कि प्रिंसिपल ने पैसे दे दिए। "112 करोड़ का मोदी मंदिर बन रहा है" जैसी हेडलाइन एक मांग को फ़ैसला बना देती है।

पैसे से जुड़ी हर बात आख़िर में राजन सिंह के बयानों तक ही जाती है। हमें कोई बजट दस्तावेज़, मंज़ूरी आदेश या सरकार का बयान नहीं मिला जिसमें यह रकम हो। इस आँकड़े की पूरी जाँच हमारे अंग्रेज़ी लेख 112 करोड़ रुपये का फ़ैक्ट चेक में है।

20 अगस्त 2026: प्रेस क्लब में मोदी चालीसा

20 अगस्त 2026, गुरुवार को, दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के एक हॉल में "मोदी चालीसा" पढ़ी गई। चालीसा चालीस छंदों की एक भक्ति कविता होती है, जो आम तौर पर किसी देवता की स्तुति में पढ़ी जाती है। The Federal पर छपी PTI रिपोर्ट के अनुसार यह पाठ प्रधानमंत्री के एक कटआउट के सामने हुआ, जिसमें उन्हें देवता जैसे रूप में दिखाया गया था। इस कार्यक्रम का नेतृत्व राजन सिंह ने किया।

प्रेस क्लब ने उसी दिन X पर बयान दिया कि उसने यह कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था। क्लब के अनुसार हॉल एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के लिए बुक हुआ था, बुकिंग की शर्तें तोड़ी गईं, और क्लब के अधिकारियों ने कार्यक्रम रुकवा दिया। The Wire के अनुसार 22 अगस्त को क्लब की अध्यक्ष संगीता बरुआ पिशारोती ने कहा कि कार्यक्रम को क्लब की कोई अनुमति नहीं थी, और जिस सदस्य ने बुकिंग की सिफ़ारिश की थी उसे और कुछ और लोगों को कारण बताओ नोटिस दिए गए।

उसी दिन PTI से बात करते हुए राजन सिंह ने फिर कहा कि बोर्ड बिहार में पाँच एकड़ ज़मीन पर 112 करोड़ रुपये का मंदिर बनाना चाहता है। उन्होंने सवाल किया कि अगर हम उनके लिए मंदिर बनाना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है। यह भी उनके अंग्रेज़ी बयान का हिंदी अनुवाद है।

ध्यान दें कि यह कार्यक्रम बोर्ड की बैठक नहीं थी, और जिस जगह यह हुआ उसी क्लब ने इससे दूरी बना ली। इसलिए इसे बोर्ड का सरकारी काम नहीं माना जा सकता। पूरी जानकारी के लिए पढ़ें प्रेस क्लब में मोदी चालीसा: क्या हुआ।

बोर्ड में ही विवाद: Queerbeat ने क्या बताया?

पहली रिपोर्टों में कहा गया था कि प्रस्ताव सबकी सहमति से पास हुआ। PTI ने यह बात राजन सिंह के हवाले से लिखी। Free Press Journal और Drishti IAS ने इसे सर्वसम्मति से पास बताया।

21 अगस्त 2026 को Queerbeat ने एक अलग तस्वीर रखी। उसकी रिपोर्ट के अनुसार:

  • बोर्ड की एक और सदस्य अनुप्रिया सिंह ने कहा कि मंदिर राजन सिंह का निजी एजेंडा है और पूरे बोर्ड का समर्थन इसे नहीं है।
  • Queerbeat ने 29 जुलाई की बैठक के जो मिनट्स (बैठक का लिखित ब्योरा) देखे, उनमें मंदिर का ज़िक्र नहीं है।
  • पटना हाई कोर्ट में वकालत करने वाले मानवाधिकार वकील प्रशांत कुमार ने 14 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत दी। उन्होंने जाँच मांगी कि कहीं प्रधानमंत्री के नाम, पद या फ़ोटो का इस्तेमाल किसी निजी काम के लिए तो नहीं हुआ, ताकि सरकारी समर्थन का आभास हो और पैसे जुटाए जा सकें।

हमने मिनट्स ख़ुद नहीं देखे हैं। शिकायत सिर्फ़ शिकायत है, किसी जाँच का नतीजा नहीं, और हमें प्रधानमंत्री कार्यालय का कोई जवाब नहीं मिला। हम इतना कह सकते हैं कि "बोर्ड ने सर्वसम्मति से मंदिर पास किया" वाला दावा अब विवादित है।

कानून क्या कहता है?

यह सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं।

संविधान का अनुच्छेद 27

अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसा टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिसकी कमाई ख़ास तौर पर किसी एक धर्म या धार्मिक संप्रदाय को बढ़ावा देने या चलाने के ख़र्च में लगाई जाए। यानी लोग अपने पैसे से मंदिर बना सकते हैं, लेकिन सरकारी पैसे से किसी धार्मिक काम पर सवाल उठ सकते हैं।

अदालतों ने पहले के मामलों में इस अनुच्छेद को परखा है, जैसे 1954 का शिरूर मठ मामला। लेकिन पटना वाले प्रस्ताव पर किसी अदालत ने कोई फ़ैसला नहीं दिया है। सरकारी पैसा लगेगा या नहीं, और लगे तो किस योजना से, यह अभी तय ही नहीं है। इस पर हमारा अंग्रेज़ी लेख अनुच्छेद 27 और मंदिरों पर सरकारी ख़र्च आसान भाषा में मामलों को समझाता है।

बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950

बिहार में सार्वजनिक मंदिरों के लिए एक पुराना कानून है, बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950। Drishti IAS की 9 अगस्त 2024 की रिपोर्ट के अनुसार इस कानून के तहत राज्य के सभी सार्वजनिक मंदिरों, मठों, ट्रस्टों और धर्मशालाओं को बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड में रजिस्टर होना ज़रूरी है। राज्य सरकार ने अधिकारियों से बिना रजिस्ट्रेशन वाले संस्थानों का रजिस्ट्रेशन कराने को कहा था।

अगर कभी मोदी मंदिर बनता है और आम लोगों के लिए खुलता है, तो वह सार्वजनिक मंदिर माना जा सकता है और उस पर यह कानून लागू हो सकता है। इसके लिए एक ट्रस्ट, ट्रस्ट डीड और ट्रस्टी चाहिए होंगे। अभी तक ऐसा कोई ट्रस्ट होने की रिपोर्ट नहीं है। पूरी जानकारी हमारे लेख बिहार धार्मिक न्यास अधिनियम और रजिस्ट्रेशन में है।

मंदिर बनने से पहले क्या-क्या होना ज़रूरी है?

कोई भी बड़ा निर्माण, ख़ास कर जिसमें सरकारी ज़मीन या पैसा मांगा गया हो, कई चरणों से गुज़रता है। नीचे वे कदम हैं जिनकी अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं है:

  1. सरकारी फ़ैसला: राज्य सरकार या कैबिनेट का लिखित आदेश, जिसमें परियोजना का नाम, तारीख़ और विभाग हो।
  2. ज़मीन: एक तय प्लॉट, उसका मालिक कौन है, और आवंटन या ख़रीद का रिकॉर्ड।
  3. पैसा: बजट में रकम, किसी योजना से मंज़ूरी, या खुले तौर पर चंदा जुटाने वाला रजिस्टर्ड ट्रस्ट।
  4. मालिक और ज़िम्मेदार संस्था: एक ट्रस्ट या संस्था जो ज़मीन और पैसे की ज़िम्मेदार हो, और ज़रूरत हो तो धार्मिक न्यास बोर्ड में रजिस्टर हो।
  5. नक्शा और अनुमति: किसी आर्किटेक्ट का डिज़ाइन और स्थानीय प्राधिकरण से निर्माण की अनुमति।
  6. भूमि पूजन: Navbharat Live (1 अगस्त) के अनुसार राजन सिंह की इच्छा है कि भूमि पूजन में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बुलाया जाए। इसकी कोई तारीख़ तय नहीं है।

यानी जब कोई पूछे कि मोदी मंदिर कब बनेगा, तो ईमानदार जवाब यही है कि अभी कोई तारीख़ नहीं है। इस सवाल पर हमारा पूरा लेख Modi Mandir Kab Banega पढ़ें।

एक नज़र में: क्या पक्का है, क्या नहीं

नीचे दी गई बातें रिपोर्टों में दर्ज हैं:

  • 29 जुलाई 2026 को बोर्ड की पहली बैठक हुई और रिपोर्टों के अनुसार मंदिर का प्रस्ताव पास हुआ।
  • राजन सिंह ने 5 एकड़ और 112 करोड़ रुपये की मांग की बात कही।
  • 20 अगस्त 2026 को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में मोदी चालीसा पढ़ी गई और क्लब ने इससे दूरी बनाई।
  • एक बोर्ड सदस्य ने प्रस्ताव पर सवाल उठाए और प्रधानमंत्री कार्यालय में एक शिकायत दी गई।

ये बातें 27 अक्टूबर 2026 तक किसी भरोसेमंद स्रोत से पक्की नहीं हुई हैं:

  • मंदिर की जगह, या कोई ज़मीन मिलना।
  • राज्य या केंद्र सरकार की ओर से कोई मंज़ूरी या पैसा।
  • प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय या बिहार सरकार का मंदिर पर कोई बयान।
  • कोई ट्रस्ट, आर्किटेक्ट, डिज़ाइन या निर्माण की तारीख़।
  • प्रस्ताव का कैबिनेट सचिवालय तक पहुँचना।

सोशल मीडिया पर सुनहरे मंदिर और सोने की मूर्ति वाली तस्वीरें भी घूम रही हैं। PatnaPress ने अपनी ही तस्वीर के नीचे लिखा था कि वह AI से बनी है। ऐसी तस्वीरें असली नक्शा या इमारत नहीं हैं। ऐसे दावों की जाँच हमारे लेख मोदी मंदिर: अफ़वाह बनाम तथ्य में है।

क्या पहले भी मोदी के मंदिर बने हैं?

हाँ, लेकिन वे छोटे और निजी थे। 2015 में राजकोट के पास एक गाँव में समर्थकों ने मोदी का मंदिर बनाया था, जिस पर मोदी ने नाराज़गी जताई थी। 2021 में पुणे में एक स्थानीय समर्थक ने छोटा मंदिर बनाया, और भाजपा नेताओं की आपत्ति के बाद मूर्ति हटा दी गई। 2017 में मेरठ में एक बड़े मंदिर की घोषणा हुई थी, पर उसके बनने का कोई सबूत हमें नहीं मिला।

पटना का मामला इसलिए अलग है कि यहाँ प्रस्ताव एक सरकारी विभाग के तहत बने बोर्ड से आया है और उसमें सरकार से ज़मीन और पैसा मांगा गया है। इसीलिए सरकारी पैसे और कानून के सवाल यहाँ ज़्यादा अहम हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या बिहार सरकार ने मोदी मंदिर को मंज़ूरी दी है?

नहीं। बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड ने एक प्रस्ताव पास किया है। राज्य या केंद्र सरकार ने ज़मीन या पैसा मंज़ूर किया हो, ऐसी कोई रिपोर्ट हमें नहीं मिली।

मोदी मंदिर पटना में कहाँ बनेगा?

कोई जगह तय नहीं हुई है। राजन सिंह ने 5 एकड़ ज़मीन की मांग की बात कही है, लेकिन किसी प्लॉट का नाम किसी रिपोर्ट में नहीं है।

मोदी मंदिर कितने करोड़ का है?

कोई सरकारी रकम तय नहीं है। 112 करोड़ रुपये वह रकम है जो राजन सिंह के अनुसार बोर्ड ने सरकार से मांगी है। यह मांग है, मंज़ूर बजट नहीं।

क्या मोदी मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है?

नहीं। 27 अक्टूबर 2026 तक हमें किसी जगह, अनुमति, भूमि पूजन या निर्माण कार्य की कोई रिपोर्ट नहीं मिली।

प्रेस क्लब में मोदी चालीसा किसने करवाई?

इसका नेतृत्व राजन सिंह ने किया। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने कहा कि उसने कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था, हॉल प्रेस कॉन्फ़्रेंस के लिए बुक हुआ था और कार्यक्रम रोक दिया गया।

स्रोत

और जानकारी के लिए देखें पटना प्रस्ताव विषय पेज, हमारी टाइमलाइन और हिंदी में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल।

आख़िरी बार 27 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया। कोई ग़लती दिखे तो हमारे संपर्क पेज से बताएँ।